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एक कविता ये भी

Posted On: 4 May, 2017 में

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निर्भया तुम तो जख्मों के बोझ को
सहती हुई चली गयी, संसार से मुख मोड़कर !
शैतानों ने मानव भक्षी राक्षसों को पीछे छोड़ दिया,
जीन्दे इंसान की चमड़ी को उखाड़ कर !
अबे, अब क्या जरूरत पड़ गयी दुर्जनों, प्राणों के भीख मांगने की !
एक सबसे बड़ा दैशतगर्द शैतान वो था जो नाबालिक की चादर ओढ़े था,
बच गया है दुनिया के क़ानून से, पर जब परवर दिगार के दरवार में जाएगा, लोहे के नुकीले नोकों से छेदा जाएगा,
कुकर्मों की सजा तो जरूर पाएगा ! जरूर पाएगा !!

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
May 16, 2017

बहुत ही सुन्दर शब्दों में श्रद्धांजलि दी है आपने / प्रणाम /

    harirawat के द्वारा
    May 17, 2017

    राजेश बेटे आयुष्मान ! टिप्पणी केलिए साधुवाद !

sadguruji के द्वारा
May 13, 2017

आदरणीय हरेंद्र रावत जी ! सादर अभिनन्दन ! आज कविता आपके ब्लॉग पर दिखी ! अच्छी कविता और निर्भया को एक श्रद्धांजलि भी ! सादर आभार !

    harirawat के द्वारा
    May 13, 2017

    सद्गुरुजी नमस्कार ! सकारात्मक टिप्पणी के लिए, साधुवाद !

sadguruji के द्वारा
May 6, 2017

आदरणीय हरेंद्र रावत जी ! सादर अभिनन्दन ! कविता तो गायब है ! बस शिक्षक भर है ! शायद कोई तकनिकी दिक्कत होगी ! सादर आभार !


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