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कंटीली झाड़ियों के बीच फंसा था मेरा दिल

Posted On: 15 Sep, 2017 में

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इस राह चले अनजान थे हम,
जब आँख खुली नीलाम्बर था,
थी झाड़ियाँ कंटीली मगर,
लगता कहीं दूर समुन्दर था,
झाड़ियाँ तो काटी हमने,
राह के पत्थर हटा दिए,
दिल झाड़ियों में फंसा रहा,
नशे में हम थे बिना पिए !
राहगीर अब बिना रुकावट,
इस राह पर आते जाते हैं,
मेरे फंसे हुए दिल पर
एक नजर जरूर लगाते हैं !
मैं भ्रम यह पाले था,
दिल मेरा मेरे पास नहीं,
समाज सेवा करते करते,
था दिल कहीं दिमाग कहीं !
और एक दिन अचानक किसी ने,
दरवाजा मेरा खटकाया,
दरवाजा खोला द्वारे पे,
कोई नजर नहीं आया !
इधर बाईं तरफ सीने में मेरे
दिल मेरा धड़क रहा था,
जन सेवक की हानि नहीं होती,
.कानों में कोई कह रहा था ! हरेंद्र

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
September 21, 2017

शोभाजी आपकी टिपण्णी एक नई ऊर्जा भरती है ! आप स्वयं एक ख्याति प्राप्त लेखिका हैं, जब आपकी टिप्पणी मिलती है तो मैं स्वयं में भी लेखक की झलक महसूस करता हूँ अपने आप में ! धन्यवाद सहित -रावत

Shobha के द्वारा
September 19, 2017

श्री रावत जी सुंदर भावनाओं से पूर्ण पंक्तियाँ

Shobha के द्वारा
September 19, 2017

श्री रावत जी सही लिखा है ग रीबी की खाई बढ़ती ही जा रही है कुछ लोग नाराजश्री रावत जी सुंदर उत्तम विचार सही है अमीरी और ग हैं मोदी जी न खाते हैं न खाने देते हैं प्रतिक्रिया नहीं जा रही थी यहाँ लेख दी


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