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ये है गीता का ज्ञान

Posted On: 1 Oct, 2017 में

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इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमवयम !
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेs ब्रवीत
;
श्रीकृष्ण भगवान बोले -मैंने इस अविनासी योग को
सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने
अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा ! १/4

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजश्रयो विदुः !
स कालेनेह महत्ता योगो नष्ट: परंतप !!

हे परंतप अर्जुन, इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को
राज ऋषियों जाना; किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से
इस पृथ्वी लोक में लुप्त प्राय होगया ! २/4

स एवॉय मया तेSद्य योग: प्रोक्त: पुरातन: !
भक्तोSसिमे सखा चेति रहस्यं ह्यात दुत्तमम !!
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन
योग आज मैंने तुझे बताया है, क्योंकि .यह बड़ा ही
रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है ! ३/४

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत !
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति !!

अर्जुन बोले, भगवन, आपका जन्म तो अर्वाचीन यानी हाल का है
और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है, अर्थात, सूर्य का जन्म कल्प
के आदि में हो चुका था, फिर मैं कैसे मान लूँ की आप ही ने
कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था ! ४/४

बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन !
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप !!

भगवान् बोले, हे परन्तप अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं,
उन सबको तू नहीं जानता, पर मैं जानता हूँ !! ५/४

अजोअपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोअपि सन !
प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भामयात्ममायया !!

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा
समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृत
को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ ! ६/४

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !
अभ्युत्थानामधर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम !!

हे भारत जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि
होती है, तब तब मैं अपने रूप को रचता हूँ, अर्थात
साकार रूप में लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ ! ७/4

सुख दु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ !
ततो युद्धाय युज्यस्व नैव पापमवा प्स्यसि !!

जय पराजय लाभ-हानि और दुःख सुख को सामान समझ कर,
उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू
पाप को नहीं प्राप्त नहीं होगा ! २/३८

कर्मण्यधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन !
माँ कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोs सत्व कर्माणि !! २/४७

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं !
इसलिए तू कर्मों का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने भी आसक्ति
न हो !!

अजो नित्य: शाश्वतो: अयम पुराणों-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे !! २/२०

यह आत्मा किसी भी काल में न तो जन्मता है और न मरता है
क्योंकि यह अजन्मा, नित्य सनातन और पुरातन है; शरीर के
मारे जाने पर भी यह नहीं मरता !

वेदा विनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम !
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्तिकम !! २/21
हे पृथा पुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित,
नित्य अजन्मा, और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको
मरवाता है और कैसे किसको मार सकता है !

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोSपराणि !
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा -
न्यन्यानि संयाति नवानि देही !! २/२२

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है
वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नए शरीरों को धारण
करता है, नया चोला जीव को उसके पुराने शरीर द्वारा किये गए कर्मों
के आधार पर मिलता है ! कर भला होगा भला अंत भले का भला !

नैंनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहकि पावक !
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत : !! २/२३

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला
सकती, पानी नहीं गला सकता और न वायु ही सूखा सकता है !!

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