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बसंत पंचमी - २२ जनवरी २०१८ सोमवार

Posted On: 22 Jan, 2018 में

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बसंत पंचमी पर
छिपके बैठी हुई आम की डाल पर,
इक कोयल मधुर गीत गाती रही,
दिवस भी पीले वस्त्रों में लिपटा हुआ,
कुदरत थी रंग बरसाती रही,
और थी धरा बसंत को बाहों में भरे,
स्वागत बसंत का करती रही !
सरसों के फूलों की माला गले में,
बसंत खड़ी मुस्कराती रही !
ये ही थी वो मिलन की घडी
हर डाल पर मुस्कराती कली,
पेड़ पौधे मगन मिलके पवन संग,
बसंती उत्सव मनाते रहे,
भवंरों का दल फिर खिले फूल पर,
गुनगुनाते रहे गीत गाते रहे !
मैं कहता रहा वो सुनते रहे,
उनके मुख बिम्ब से फूल गिरते रहे ! १ !

एक मिलन ऐसा भी
मैं कहता रहा वो सुनते रहे,
गिला शिकवा पे अश्क बहते रहे,
नाव चलती रही दरिया बहती रही,
हवा भी सनसनाती रही,
यादों का झरना पर्वत शिखर से,
सुरीले स्वरों में झरता रहा !
दूर कहीं दूसरी नाव पर,
माझी विरह गीत गाता रहा,
खामोस पेड़ों की डालियों पे,
चकवा चकवी को मनाता रहा,
दोनों किनारे नदी घाट पर,
पशु पक्षी भी स्नहे की चादर लपेटे,
चह चहाते रहे, सिंघे भिड़ाते रहे,
मयूरी मयूरों के गिरते हुए,
कीमती आंसुओं को पीते रहे,
मैं कहता रहा वो सुनते रहे,
गिला शिकवा पे अश्क बहते रहे ! २ !
बादलों एक टुकड़ा उड़ता हुआ,
ऊपर से नीचे उतरता हुआ,
पर्वत शिखर से टकरा गया,
नन्ने नन्ने टुकड़ों में बिखरा हुआ,
हवा का झोंका उड़ा ले गया,
कुछ टुकड़ों को पीछे छोड़ कर !
जैसे बिछुड़ जाते पेड़ों से पत्ते,
पेड़ों से नाता सदा तोड़ कर !
बिछुड़े हुए दर्द को याद करके,
अश्रु चक्षुवों से बहते रहे,
मैं कहता रहा वो सुनते रहे,
गिला शिकवा पे अश्रु बहते रहे ! हरेंद्र

मैं तो पहरेदार हूँ,
जिंदगी क्या है बला,
आया पहली बार हूँ,
“है किसी की मंहगी कार,
और गले मोती हार,
करोड़ों की सम्पति है,
और सोने के हैं किवाड़ “!
फिर बटोरे जा रहा है,
जो चाहता है पा रहा है,
जिंदगी के गीत को,
अपने स्वरों में गा रहा है,
और आंसू निर्धनों के,
जाम में उनको मिलाके,
पी रहा है जी रहा है,
हूँ मसिया निर्धनों का,
हर किसी से कह रहा है ! हरेंद्र

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
January 23, 2018

जय श्री राम हरेंद्र भाई जी बसंत पंचमी पर लिखी सुन्दर कविता के लिए साधुवाद./बसंत पंचमी सरस्वती माँ की पूजा के प्रतीक के साथ सर्दी का अंत और गर्मी की षुरूहात का मन जाता यदपि अब मौसम में वह वदलाव नहीं देखने को मिलता.साथ ही १२ ऋतुओ में बसंत सबसे अच्छा समझा जाता.गावो में खेतो में चारो तरफ सरसो के खिलते फूल देख बहुत अच्छा लगता है.हरेंद्र जी आपकी कविताएं सुनकर बहुत खुशी होती है और आनद आताहै.

    harirawat के द्वारा
    January 23, 2018

    रमेश जी नमस्कार ! समय समय पर आप मधुर शब्दों से मुझे जगा देते हो, मैं क्या हूँ अहसास करा देते हो, इसके लिए मैं आपको साधुवाद कह कर आपकी लेखनीको दिल से लगा लेता हूँ !

Shobha के द्वारा
January 23, 2018

श्री रावत जी अति सुंदर भाव पूर्ण बसंत पर लिखी गयी कविता

    harirawat के द्वारा
    January 23, 2018

    शोभा जी नमस्कार, काफी अर्से वाद आपकी सकारात्मक टिप्पणी मिली, धन्यवाद !

harirawat के द्वारा
January 22, 2018

आओ साथियो, ज़रा गुनगुनाओ, कुछ मेरी सुनो, कुछ अपनी सुनाओ ! समय तो यों ही चला जा रहा है, हम भी हैं इस धारा पर, पड़ोसियों को अहसास कराओ ! धन्यवाद


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