jagate raho

Just another weblog

423 Posts

1036 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12455 postid : 1363519

बचपन की यादें ! आज तो गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं !

Posted On 14 Feb, 2018 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

प्राइमरी स्कूल 4 किलो मीटर दूर घने जंगलों और ऊंचाइयां नापते हुए,
एक पांच साल के बच्चे के लिए सोचिये कितना कठिन होता होगा ? अगर
गाँव छोटा हुआ तो ऐसा भी अवसर आया जब बच्चे को अकेला ही जाना पड़ा,
मैं भी इसका भुक्त भोगी हूँ ! मैंने निश्चय किया की जो परेशानी मैंने भोगी,
वो मेरे बच्चे न भोंगे ! यही समस्या पूरे गढवालियों और कुमावनियों की थी !
मैं 9 साल का था, स्कूल जाने के लिए दो रास्ते थे, एक बाईं तरफ तीन मील की सीधी चढ़ाई थी,
रास्ता कठीन जरूर था लेकिन जंगल नहीं था, पहाड़ के ऊपर चढ़ कर दूसरी तरफ से
वैसे ही सीधी उतराई थी ! चढ़ाई थी लेकिन जंगल के रास्ते से सुरक्षित था ! एक दिन सुबह सुबह
मैं जंगल के रास्ते से ही चल पड़ा, चढ़ाई तो यहां भी थी लेकिन सीधी नहीं थी, जरा घुम्मावदार थी !
जैसे ही मैं जंगल में दाखिल हुआ, चीड़ों के पेड़ पर बहुत से बन्दर बैठे थे, मुझे देखते ही तीन मोटे
मोटे बन्दर खाऊं खाऊं करते हुए पेड़ से उतर कर मेरी ओर आने लगे ! वैसे गाँवों में रोज ही
लंगूरों और बंदरों से पाला पड़ता था, लेकिन वहां मेरे साथ बड़े लोग भी होते थे ! उन दिनों हरेक गाँव में
जुझारू कुत्ता पाला जाता था, जो बंदरों की पूरी सैना को भगाकर फसलों की रक्षा करने में मदद करता था !
बंदरों ओर लंगूरों में इतना अंतर है की बन्दर अकेले आदमी को डराता है, मिशाल भी है, “बन्दर घुड़की” !
लेकिन अगर लंगूरों की पूरी सेना भी पेड़ों पर बैठी हो , अगर आप उन्हें बिना छेड़े अपने रास्ते जा रहे हो तो
वे आपको कुछ नहीं करेंगे, लेकिन अगर छेड़ दिया तो अकेले बच्चे की खैर नहीं ! बड़े आदमी से वे कोई पंगा
नहीं लेते थे ! बस्ता उन दिनों भारी नहीं होता था ! मैं पहली क्लास में था इसलिए तख्ती बांस की कलम तथा तख्ती पर
लिखने के लिए एक प्रकार की सफ़ेद मिट्टी होती थी, जिसे आम भाषा में कमेड़ा बोला जाता था,
गाँव में ही लकड़ी की दवात (आम भाषा में बुखल्या बोला जाता था ) बना दी जाती थी तथा कमेड़ा इसी में डालदेते थे
तथा लिखने से पहले पानी स्कूल में ही डाला जाता था, एक छोटी सी हिंदी की पुस्तक होती थी ! ये तीनों वस्तुवें एक थैले में
डाल कर पीठ पर लटका दिया जाता था !
मैं भी थैले को लटका कर बिल्कुल अकेला अपने बिचारों में चला जा रहा था, बंदरों की खाऊ खाऊ सुनते ही एक बार मेरे
सारे बदन में सिहरन उठी ! गनीमत थी की मैं भागा नहीं , नहीं तो ये मेरी हालत बद से बेहतर कर देते ! फिर गाँव का बच्चा,
इस किस्म के बंदर लंगूरों से रोज ही पाला पड़ता था, मैंने अपने आस पास नजर फेरी, एक पत्थर मेरे हाथ लग गया, मैंने निशाना
लगाकर आगे आने वाले बन्दर के दे मारा, पत्थर उसके पेट में जा लगा, वह उलटा भाग पड़ा और उसी के साथ मेरी तरफ आने वाले
तीनों बन्दर भी अपनी जान बचाते हुए भाग खड़े हुए ! इससे एक शबक तो सीखा की कभी ऐसे मौकों पर मैदान छोड़कर भागने के
उससे बचाव की युक्ति सोचें, कोई न कोई युक्ति जहन में उतर आजाएगी ! इसी तरह अकेला चलते हुए घंने जंगल में दो गीदडों से पाला
पड़ गया था ! “गीदड़ भभकी” – मुझ अकेले बच्चे को दो गीदड़ों ने देख लिया ! एक पूरब दिशा की तरफ था, दूसरा पश्चिम की ओर !
वे नर मादा थे, मादा मोटी थी वहीं नर उसके मुकाबले जरा हल्का फुल्का चटक मटक था ! उनहोंने ने मुझे देखते ही मेरी ओर बढ़ना
शुरू किया ! पहले मेरी नजर में एक ही पड़ा, वह मुंह खोल कर मुझे डराने की चेष्टा कर रहा था, दूसरी ओर से भी डरावनी आवाज आरही थी,
तभी मेरी नजर दूसरे गीदड़ पर पडी ! बच्चा ही तो था, फिर घना जंगल. कोई पक्षी भी नजर नहीं आ रहा था, समय सुबह करीब ९ बजे का था,
मेरी आवाज सुनने वाला वहां कोई नहीं था ! वे दोनों मेरे से सात फ़ीट नजदीक तक आ धमके, वहीँ एक कटावदार पत्थर मेरे हाथ लग गया,
मैंने बिना निशाना लगाए ही मादा गीदड़ की ओर वह पत्थर फेंका, कुदरती पत्थर उसके सर पर जा लगा, उसके सर से खून बहने लगा, इस प्रकार चोट खाकर वे
दोनों गीदड़ वहां से नौ दो ग्यारह होगए और मैं बिना किसी डर के अपनी स्कूल में ठीक १० बजे पहुँच गया था !
आज एक मील की दूरी पर दूसरे गाँव में पांचवी क्लास तक स्कूल खुल गयी है, लेकिन आने जाने की परेशानियों के कारण मेरा गाँव तो पूरा खाली
हो चुका है ! १०वीं १२वीं पास करने के लिए बच्चों को ७ मील दूर या तो पौखाल या मटियाली डाडामंडी जाना पड़ता है ! पूरे गाँव में केवल एक दो ही परिवार हैं वे भी दिन में बन्दर, लंगूरों से और रात को बाग़ के डर के दैशत में जी रहे हैं ! पड़ोसी गाँव जो हमारे गाँव के मुकाबले काफी बड़ा गाँव था, आज वहां भी आधे से ज्यादा परिवार आजीविका तथा बच्चों की सुरक्षा के लिए गाँव से पलायन कर चुके हैं ! स्कूलों की बात अगर छोड़ भी दें तो, प्रार्थमिकी चिकित्सा का भी कोई प्रबंध नजदीक कहीं नहीं है ! सैना से अवकास प्राप्त बुजुर्गों को – पांच छह किलो मीटर की चढ़ाई उतराई पार करके पौखाल पोस्ट आफिस या स्टेट बैंक से पेंशन लेने तथा राशन खरीदारी के लिए तो आना जाना ही पड़ता है ! नेता लोग अपने चम्मचों सहित आज भी बीरान पड़े मकानों को देखने आते हैं, पांच साल में एक बार केवल वोट लेने के बहाने ! खाली पड़े वीरान मकानों के आगे अपनी नयी नयी योजनाओं का बखान करके चले जाते हैं ! पानी के श्रोत हैं लेकिन वर्तने वाले नहीं हैं ! सामने ह्वेल नदी नाम की नदी बहती है, गर्मियों में कुछ लोग अपने परिवार के साथ बंद पड़े घरों को खोलते हैं, सफाई तथा मरम्मत करते हैं, नदी में मच्छली मारते हैं, गर्मियों के कुछ दिन बिताकर वापिस चले जाते हैं ! हम जैसे बुजुर्ग जिनके पाँव चढ़ाई उतार चढ़ने में मजबूर हो गए हैं चाहते हुए भी गाँव नहीं जा पा रहे हैं ! अगर गाड़ी गाँव के नजदीक तक आजाती तो कमसे से दिल्ली की गर्मी से निजात पाने के लिए गर्मियों में तो गाँव जा ही सकते थे !
मेरे समकक्ष गढ़ बंदु जरूर इस तरह की मजबूरियों से रूबरू हो रहे होंगे, वे इस लेख को पढ़ कर अपने विचार जरूर व्यक्त करें ! धन्यवाद !

लेकिन सत्यव्रती, भाजपाके लोग ऐसे भ्रष्ट मवेशी चारा तक भक्षण
करने वाले को स्वीकार नहीं करेंगे ! पाप के भागी नहीं बनेगे !
लालू-राबड़ी और सारे बच्चों के नाम अरबों की सम्पति जमा
करने के बाद अब संन्यास लेने से पाप कमजोर नहीं पड़ेंगे !
यहाँ के क़ानून से तो बचे हो, लेकिन यम के डंडे से कौन बचाएगा !
यहां की सम्पति यहीं रह जाएगी, वहां घूस खिलाने के लिए
एक ढेला भी जेब में नहीं होगा ! अभी समय है ये पूरी सम्पति धन दौलत,
सोना-चांदी, रुपया पैसा, गरीबों को लौटा दो, मोक्ष मिल जाएगा !
रावण को हनुमान जी ने यही कहा था “रावण अभी भी समय है,
मोक्ष चाहता है तो, सीता को इज्जत के साथ भगवान् राम के पास भेजदे
और उनके चरणों में गिर जा, पापों से मुक्ति मिल जाएगी !

कंस ने यह जानते हुए की देवकी के
आठवें गर्व से उसका अंत होगा, वह हर बच्चे को पैदा होते
ही मार देता था, ताकि उसके पापकर्मों का जल्दी अंत हो जाय !
आज के ये नेता सोचते हैं की वे अमृत पी के आए हैं, केवल
कुर्सी पर बैठकर जनता के रक्त को निकाल निकाल कर
पीने के लिए !

मन के लड्डू खाते खाते बूढ़ा होजाएगा, किसी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का
चेयरमैन भी नहीं बन पाएगा ! बेचारा पप्पू ! देश एक नई करवट लेचुका है,
परिवारवाद से मुक्ति पा चुका है ! जय बजरंगी !
खीर खाए दुर्जन फांसी चढ़े नेक, जो तमाशा कहीं न देखा यहां आकर देख !

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 14, 2018

श्री रावत जी दिलचस्प संस्मरण लिखने के लिए एक प्रकार की सफ़ेद मिट्टी होती थी, जिसे आम भाषा में कमेड़ा बोला जाता था, गाँव में ही लकड़ी की दवात (आम भाषा में बुखल्या बोला जाता था ) बना दी जाती थी तथा कमेड़ा इसी में डालदेते थे बचपन याद दिला दिया


topic of the week



latest from jagran